मैंने अक्सर ही गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी को मन की शांति और आत्म संतुष्टि के लिए यह मूल मंत्र देते हुए सुना है - की कभी भी दूसरों की नीयत पर हमे शक नहीं करना चाहिए ।
और अगर आप इस बात को थोड़ा गहराई मे सोचें तो आप पाएंगे की, अक्सर हमारे मन की अशान्ति का कारण हमारा चंचल मन बनता है जो या तो बातों को खींच कर प्रस्तुत करता है या फिर हमे दूसरों के इरादों या नीयत पर शक करने के लिए कहता है ।
कोई कितना भी अच्छा या भला काम कर रहा हो, मगर आपका मन पहले उसके नकारात्मक नजरिए पर ही जाएगा ,यह एक मानव मन की प्रवत्ति है आप कह सकते हैं।
आप इससे इस तरह से सोचिए ,
की क्या आप अपने सोच मात्र से सामने वाले का इरादा बदल सकते हैं ?
क्या आपके मन की अशान्ति का कारण वो इंसान है , या आपका मन खुद?
क्या आपके अत्यधिक सोचने से आपकी तकलीफें हाल हो जायेंगी?
मुझे यकीन है इन सभी सवालों का जवाब ना मे ही पाया होगा आपने ।
फिर हम क्यूँ अक्सर ही कयास लगते हैं की सामने वाला जो कर रहा है उसका धेय , दिखने वाले उद्देश्य से अलग है?
हम क्यूँ अक्सर अपने आप को मन की जंजीरों मे जकड़ा हुआ पाते हैं , जब की हमे पता है की मन से बँधा हुआ शरीर सिर्फ एक काया बन कर रह जाता है ?
हम क्यूँ हर विचार की शुरुआत एक नकरात्मा नजरिए से करते हैं ?
अगर हम अपने सोच और जीवन मे बस एक छोटा स बदलाव लेके आ पाएं और शुरुआत हमेशा एक सकारात्मक नजरिए से करें, तो हम पाएंगे की हमारा जीवन न ही ज्यादा खुशहाल होगा, बल्कि हमारे रिश्ते भी ज्यादा मजबूत होंगे समय के साथ।
अपने मन को भटके से रोकने के लिए गुरुजी ने कई तरीके भी बताए हैं, जैसे की भस्त्रिका और प्राणायाम।
जब भी आपका मन भटकने की राह पर निकाल रहा हो, आप भस्त्रिका कर उससे वापिस अपने यथा इस्तिथि पर ला सकते हैं ।
बातों का सर यह है की - लोगों के इरादे को भापने की चाह मे अपने मन की शांति का त्याग करना उचित नहीं है, कोशिश करें की आप वर्तमान मे जियें और भविष्य काल के कयास लागने, या गुजरे हुए पालो मे जीवन बिताने से बचें।
मस्ती मे जियें , सबसे प्यार करें, और खुल कर हसें !💓
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